✍️ रिफअत बरकाती
Owner: Radd-e-Batil Reaction
अभी कुछ दिन पहले ही मैंने अपने एक बयान में लोगों के दरमियान ये बात रखी थी कि जिस तरह आपके खर्चे हैं उसी तरह आपकी मस्जिद के इमाम साहब के भी ख़र्चे होते हैं, और रही बात सब्रो क़नाअत की... तो याद रखें! इमाम साहब मदरसे में मिली तरबियत और अल्लाह वालों की पाकीज़ा ज़िन्दगी से हासिल होने वाले सबक की वजह से बेशक सब्रो क़नाअत कर लेंगे और करते भी हैं, लेकिन! उनके बच्चे उनकी बीवी तो आप ही के (यानी आम लोगों के) घर की ही लड़की होती हैं ना?? वो तो आम लोगों जैसी ही होती हैं, और अगर किसी तरह वो अपने शौहर की सोहबत का असर अपने उपर लाती भी है... तो साल भर में कई सारे ऐसे मौके आते हैं जब इमाम साहब के बच्चे आपके बच्चों के करीब होते हैं उनकी बीवी आपके घर की औरतों के पास होती हैं... ऐसे में आपके बच्चों के कपड़े नाज़ नखरे बेशक क़ीमत खिलौने वो देख कर क्या सोचते होंगे इसका आप भी अंदाजा कर सकते हैं, आपके घर की औरतों के बेशकीमती लिबास उनके जेवरात देख कर इमाम साहब की बीवी बच्चों के भी अरमान जागते होंगे कि नहीं?? यकीनन जागते होंगे। तो अब आप सोचें कि आप पच्चीस हजार पचास हजार एक लाख की माहाना आमदनी में भी घर का खर्चा पूरा न होने की शिकायत उसी इमाम साहब के पास करते हैं.... लेकिन एक बार भी आपको ख्याल नहीं आता कि इमाम साहब का घर, बीवी बाल बच्चों का गुज़ारा सिर्फ़ 8000 से 10000 में कैसे होता होगा?
कितने ज़ालिम हैं आप! कि उसी इमाम साहब से अपने कारोबार में तरक्की के लिए, बच्चों की आमदनी में इजाफा के लिए,उनके बिगड़े हुए काम बनाने के लिए तावीज़ लेने की जरूरत पड़ने पर इमाम साहब से Free में साल भर में कितनी बार तावीज लें जाते हैं मगर एक बार भी ख्याल नहीं आता कि खुद इमाम साहब हम बस्ती वालों से मिलने वाले 8. से 10 हज़ार रुपए से कैसे काम चलाते होंगे? इनके बच्चों की ख्वाहिशात बीवी की जरूरतें कैसे पूरी होती होंगी?
बहुत से लोग बड़ी चालाकी से कह देते हैं कि इमाम साहब के पैसे में बड़ी बरकत होती है। इतने कम पैसों में इनका काम चल जाता है ऐसे लोगों को चाहिए कि बरकत वाले 8, 10 हज़ार रुपए इमाम साहब से ले कर आप अपना बे बरकत वाले 25, 50 हज़ार रुपए इमाम साहब को दे दें, ताकी इमाम साहब की तरह आपके काम इस बरकत वाले पैसे से निकल जाया करें, मगर ये तो गलती से भी करने को आप राज़ी नहीं होंगे,
लिहाज़ा! क़ौम के मालदार और मस्जिद के मिमबरान हज़रात को चाहिए कि इस इमाम साहब के इस दर्दनाक हादसे से सबक लेते हुए अपने अपने इमामे मस्जिद की खबरगीरी करते रहा करें और ज़माने के तक़ाज़ों को सामने रखकर अपनी मस्जिद के इमाम साहब की तन्खवाह में कम से कम 5000 पांच हज़ार बढ़ाएं और अपने ज़िन्दा दिल होने का सुबूत दें।
या तन्खवाह में एक दो हज़ार रुपए बढ़ा कर उनकी आमदनी के जो दूसरे जरिए हैं उनमें इज़ाफ़ा करें, मसलन ट्यूशन अगर पढ़ाते हैं तो ट्यूशन फीस बढ़ा दें,
मीलाद शरीफ़ में बाहर से आने वाले नात ख्वां खतीब हजरात को तो बड़ी खुश दिली से कम से कम एक हज़ार रुपए दे देते हैं मगर अपनी मस्जिद के इमाम साहब को देना हो तो 200, 400 में निपट लेने को अपनी अक्ल मन्दी समझते हैं, मुश्किल से 500 ₹ कोई दे दें तो उन्हें यूं लगता है जैसे इमाम साहब पर एहसाने अज़ीम कर दिया,
प्यारे मुसलमान भाईयों! अपनी सोच बदलें और जितना बाहर से आने वाले खतीब व शायर को नज़राने देते हैं आपकी मस्जिद के इमाम साहब का भी हक है कि इनको भी उतना ही नज़राने आप पेश करें। क्योंकि हर सुख दुख में आपके इमाम साहब आपके साथ होते हैं न कि बाहर से आने वाले शायर या खतीब।
नियाज़ फातिहा में पहले से ज्यादा लोगों को नज़राने देने पर आमादा करें, बाज़ मक़ाम पर आज भी 10 से 20 ₹ देने का रिवाज है, हालांकि कम से कम 50 ₹ ज़रूर देने चाहिए।
शादी ब्याह में जहां बेशुमार दौलत खर्च किए जाते वहीं लड़का की शादी हो या लड़की की 1000, 500 ₹ अगर अपने मस्जिद के इमाम साहब को यूं ही शादी के नाम पर दे दें तो कितना अच्छा हो जाएगा? निकाह पढ़ाने में नज़राने सिर्फ इमाम साहब को 5000 पांच हज़ार दे दिये जाएं तो इमाम साहब के सर से क़र्ज़ का बोझ काफी हद तक उतर जाएगा और फिर आइंदा किसी इमाम के खुदकुशी करने की खबर नहीं आएगी।
वरना याद रखें! हदीस शरीफ़ में है कि
हर ज़िम्मेदार से उसकी ज़िम्मेदारी के बारे में (क़यामत में) सवाल होगा
आप पर अपनी मस्जिद के इमाम साहब की देख भाल की भी ज़िम्मेदारी है जिस से आप उस वक़्त तक बरीउज़ ज़िम्मा नहीं हो सकते जब तक की आप अपनी मस्जिद के इमाम साहब की ज़रूरतों के मुताबिक उनके नज़राने बढ़ा कर उन्हें खुदकुशी जैसे हराम काम से बचाने की कोशिश नहीं करेंगे।
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Note: इस Article को अगर आप अपने नाम से Share करना चाहें तो आपको मेरी तरफ से पूरी इजाज़त है, मकसद सिर्फ ये है की इस तहरीर को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक Share किया जाए।
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